osho in hindi
आंखों में आंसू की जो ग्रंथियां हैं वे बराबर हैं; पुरुष की हो, चाहे स्त्री की आंख, उसमें रत्ती भर फर्क नहीं है। इसलिए कि प्रकृति ने तो आंखें दोनों की रोने के लिए ही बनायी हैं, लेकिन मर्द रोयेगा नहीं। क्रोध की जितनी ग्रंथियां पुरुष में हैं उतनी ही स्त्री में हैं, उसमें कोई फर्क नहीं।
लेकिन पुरुष दबाता है; उसे दबाना सिखाया जाता है। दबाते-दबाते चालीस साल के करीब वह वक्त आ जाता है, इसके बाद झेलना मुश्किल हो जाता है।
पुरुष मरते हैं हृदय रोग से, स्त्रियां नहीं मरतीं। रो-धो लेती हैं, हल्की हो लेती हैं। रोज निपटारा हो जाता है, इकट्ठा नहीं हो पाता। क्रोध कर लेती हैं, नाराज हो जाती हैं, दूसरे को न मार सकें तो खुद को पीट लेती हैं।
यह जानकर हैरान होंगे कि पुरुष स्त्रियों से दुगुने पागल होते हैं। और आमतौर से आप सोचते होंगे स्त्रियां ज्यादा आत्महत्या करती हैं तो आप गलती में हैं। न तो स्त्रियां ज्यादा पागल होती हैं और न ज्यादा आत्महत्या करती हैं; पुरुष ही करते हैं। अपराध भी स्त्रियां कम करती हैं, पुरुष ही करते हैं।
जैसे सारे उपद्रव पुरुष करता है!
पुरुष सारी मवाद को इकट्ठा करता चला जाता है। फिर वह इतनी इकट्ठी हो जाती है, कि जब फूटकर बहती है तो उससे दुर्घटना ही होती है।

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