osho in hindi
शतपथ ब्राह्मण में
एक प्रश्न है :
" को वेद मनुष्यस्य ? मनुष्य को कौन जनता है ?"
कौन जनता है मनुष्य को ? कौन सा वेद जनता ? कौन सा शास्त्र जनता है ? कौन सी किताब है जो मनुष्य के राज खोल सकी है ?
सारे शास्त्रों ने , सारी किताबों ने , सारे ज्ञानियों ने , सारे प्रबुध्द पुरुषों ने मनुष्य के रहस्य की तरफ इशारा किया है |
यही कहा है : चुप हो जाओ तो शायद कुछ पहचान हो ; खोजो मत , ठहर जाओ , तो शायद कुछ झलक मिले |
मन का उपयोग न करो , क्योंकि मन की सीमा है और यह चेतना असीम है |
सीमित साधन का उपयोग करोगे तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे | साधन ही बाधा बन जाएगा |
मनुष्य को पहचानना हो तो मन से गहरे जाना होगा |
मनुष्य शरीर नहीं है , मन भी नहीं है ; इन दोनों के पीछे छिपा हुआ चैतन्य है , साक्षी है | जो मन के पार है , उसे जानने की भाषा में नहीं जाना जा सकता |
उसे तो प्रेम की भाषा में पीया जा सकता है |
और मन के पार हो जाने की प्रक्रिया का नाम ध्यान है |
इसलिए जिसे ध्यान में प्रवेश करना है
उसे सारे शास्त्रों को अग्नि को समर्पित क्र देना होता है |
वही एक यज्ञ करने जैसा है | वही एक हवन धार्मिक व्यक्ति के योग्य है | खाक कर दे सारे शब्दों को , चाहे वे कितने ही सुंदर हों , कितने ही प्यारे लोगों ने कहे हों , इससे कुछ भेद नहीं पड़ता |
क्योंकि शब्द तो मन तक ही जाएंगे | उनकी दौड़ उसके आगे नहीं |
जहां निःशब्द शुरू होता है , वहीं मनुष्य की असली सत्ता का प्रारंभ है |
जहां विचार गिर जाते हैं और निर्विचार का आयाम खुलता है , वहीं मनुष्य की चेतना में पहली दफे तुम्हारा प्रवेश होता है |
जहां तक मन वहां तक तुम नहीं | अ - मन आया वहीं तुम हो |
फिर स्वभावतः इस रहस्य को कोई और नहीं जी सकता है |
प्रत्येक व्यक्ति को अपना रहस्य स्वयं जानना होगा | इसलिए शतपथ ब्राह्मण ठीक ही कहता है
" को वेद मनुष्यस्य ? मनुष्य को कौन जनता है ? "
तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हें कोई भी नहीं जान सकता है |
और तुम भी तभी जान सकोगे जब अतिक्रमण कर जाओ देह ,मन का |
जब इन दोनों की सीढ़ियों पर चढ़ जाओ तो मंदिर में प्रवेश हो |
केवल तुम्हारे और कोई तुम्हें नहीं जान सकता |
और तुम्हारा भी जानना जानना नहीं कहा जा सकता , जीना ही कहा जा सकता है |
जानने में फासला होता है | जिसे तुम जानते हो वह और , जो जनता है वह और |
जानने में द्वैत होता है ------ अनिवार्य , बिना द्वैत के जानना सधेगा नहीं |
वहां जिसको तुम जान रहे हो , ज्ञेय ; जो जान रहा है , ज्ञाता ------ इन दोनों के बीच के संबंध का नाम ही ज्ञान है |
लेकिन स्वयं को जानने में तो द्वैत नहीं हो सकता |
वहां तो जानने वाला और जाना जाने वाला एक है |
इसलिए जानने की भाषा वहां काम नहीं आएगी |
जीने की भाषा काम आएगी | जीना ही वहां जानना है , जीना ही वहां पहचानना है |
कौन जनता है मनुष्य को ? कौन सा वेद जनता ? कौन सा शास्त्र जनता है ? कौन सी किताब है जो मनुष्य के राज खोल सकी है ?
सारे शास्त्रों ने , सारी किताबों ने , सारे ज्ञानियों ने , सारे प्रबुध्द पुरुषों ने मनुष्य के रहस्य की तरफ इशारा किया है |
यही कहा है : चुप हो जाओ तो शायद कुछ पहचान हो ; खोजो मत , ठहर जाओ , तो शायद कुछ झलक मिले |
मन का उपयोग न करो , क्योंकि मन की सीमा है और यह चेतना असीम है |
सीमित साधन का उपयोग करोगे तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे | साधन ही बाधा बन जाएगा |
मनुष्य को पहचानना हो तो मन से गहरे जाना होगा |
मनुष्य शरीर नहीं है , मन भी नहीं है ; इन दोनों के पीछे छिपा हुआ चैतन्य है , साक्षी है | जो मन के पार है , उसे जानने की भाषा में नहीं जाना जा सकता |
उसे तो प्रेम की भाषा में पीया जा सकता है |
और मन के पार हो जाने की प्रक्रिया का नाम ध्यान है |
इसलिए जिसे ध्यान में प्रवेश करना है
उसे सारे शास्त्रों को अग्नि को समर्पित क्र देना होता है |
वही एक यज्ञ करने जैसा है | वही एक हवन धार्मिक व्यक्ति के योग्य है | खाक कर दे सारे शब्दों को , चाहे वे कितने ही सुंदर हों , कितने ही प्यारे लोगों ने कहे हों , इससे कुछ भेद नहीं पड़ता |
क्योंकि शब्द तो मन तक ही जाएंगे | उनकी दौड़ उसके आगे नहीं |
जहां निःशब्द शुरू होता है , वहीं मनुष्य की असली सत्ता का प्रारंभ है |
जहां विचार गिर जाते हैं और निर्विचार का आयाम खुलता है , वहीं मनुष्य की चेतना में पहली दफे तुम्हारा प्रवेश होता है |
जहां तक मन वहां तक तुम नहीं | अ - मन आया वहीं तुम हो |
फिर स्वभावतः इस रहस्य को कोई और नहीं जी सकता है |
प्रत्येक व्यक्ति को अपना रहस्य स्वयं जानना होगा | इसलिए शतपथ ब्राह्मण ठीक ही कहता है
" को वेद मनुष्यस्य ? मनुष्य को कौन जनता है ? "
तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हें कोई भी नहीं जान सकता है |
और तुम भी तभी जान सकोगे जब अतिक्रमण कर जाओ देह ,मन का |
जब इन दोनों की सीढ़ियों पर चढ़ जाओ तो मंदिर में प्रवेश हो |
केवल तुम्हारे और कोई तुम्हें नहीं जान सकता |
और तुम्हारा भी जानना जानना नहीं कहा जा सकता , जीना ही कहा जा सकता है |
जानने में फासला होता है | जिसे तुम जानते हो वह और , जो जनता है वह और |
जानने में द्वैत होता है ------ अनिवार्य , बिना द्वैत के जानना सधेगा नहीं |
वहां जिसको तुम जान रहे हो , ज्ञेय ; जो जान रहा है , ज्ञाता ------ इन दोनों के बीच के संबंध का नाम ही ज्ञान है |
लेकिन स्वयं को जानने में तो द्वैत नहीं हो सकता |
वहां तो जानने वाला और जाना जाने वाला एक है |
इसलिए जानने की भाषा वहां काम नहीं आएगी |
जीने की भाषा काम आएगी | जीना ही वहां जानना है , जीना ही वहां पहचानना है |

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