Tuesday, 23 June 2015

जैनियों के चौबीस तीर्थंकर ही क्षत्रिय हैं- ओशो


osho in hindi

जैनियों के चौबीस तीर्थंकर ही क्षत्रिय हैं, आक्रामक घरों में पैदा हुए। और अगर कभी इनके हार्मोन की कोई व्याख्या हो सकती—अब तो मुश्किल है—तो इन सबके भीतर आक्रमण के भयंकर हार्मोन रहे होंगे। क्योंकि क्षत्रिय घरों में पैदा हुए थे, राजाओं के बेटे थे। इनकी सारी परंपरा, इनके मां—बाप का सारा ढंग आक्रमण का था। हार्मोन तो वसीयत में मिलते हैं, हिरेडिटरि होते हैं। ये चौबीस जैनों के तीर्थंकर, बुद्ध, ये सब क्षत्रिय हैं—और इन सबने अहिंसा का उपदेश दिया! ये सब हिंसक घरों में पैदा हुए और हिंसा इनकी बपौती थी, और इन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया! निश्चित ही ये इतने गहन रूप से साक्षी हो गए होंगे कि इनके आक्रमण के हार्मोन इन पर कोई प्रभाव नहीं कर सके।

यह बड़े मजे की बात है कि अब तक कोई भी, एक ब्राह्मण भी—एक भी ब्राह्मण—अहिंसा का उपदेष्टा नहीं हुआ है। और खतरनाक से खतरनाक जिस ब्राह्मण को हम जानते हैं वह परशुराम है, जिसने क्षत्रियों को पृथ्वी से कई दफे समाप्त कर दिया। और ये पच्चीस—एक बुद्ध और चौबीस जैनों के तीर्थकर—ये सब क्षत्रिय हैं, जिनके खून में लड़ाई थी, लेकिन ये अहिंसा के उपदेष्टा बन सके।
परशुराम और इनके बीच एक ही बात घट रही है। परशुराम भी साक्षी हैं। और साक्षी होकर परशुराम ने जाना—उसके ब्राह्मण के हार्मोन सारे के सारे अहिंसा के हैं—लेकिन साक्षी होकर परशुराम को दिखाई पड़ा कि क्षत्रियों ने भयंकर उत्पात कर रखा है। सारे जीवन को उपद्रव से भर दिया है। इनके कारण ही हिंसा है। हिंसा को मिटाने के लिए परशुराम ने सारे क्षत्रियों का सफाया शुरू कर दिया।
एक ब्राह्मण इतनी हिंसा कर सकता है, अगर साक्षी जगे। तो कर्म से अपने को अलग कर लेता है, फिर सोच पाता है कि क्या करना उचित है और क्या करना उचित नहीँ। ये पच्‍चीस—तीर्थंकर और एक बुद्ध—ये सब क्षत्रिय हैं, इनके पास लडाई का तत्व है, इनके खून में लड़ाई है, लेकिन साक्षी— भाव ने दिखाया कि लड़ाई व्यर्थ है, और उससे कुछ परिणाम नहीं निकलते। वे शांत हो गए और उनके जीवन से हिंसा बिलकुल गिर गई।

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